Дар васли ту азми дили ман рӯзи нахуст

در وصل تو عزم دل من روز نخست

Он буд ки умр бо ту бигзорам чуст

آن بود که عمر با تو بگذارم چست

Кӣ донистам ки баъд аз он азми дуруст

کی دانستم که بعد از آن عزم درست

Он рӯз ба хоби шаби ҳаме бояд ҷуст

آن روز به خواب شب همی باید جست