Рӯй ту ки ақли азу хаҷал меояд
روی تو که عقل ازو خجل میآید
Моҳӣаст ки баси меҳр гусал меояд
ماهی است که بس مهر گسل میآید
Давр аз рӯят чу шамъ азон мисўзм
دور از رویت چو شمع ازان میسوزم
Каз шамъи рахти сӯз ба дил меояд
کز شمعِ رخت سوز به دل میآید
Рӯй ту ки ақли азу хаҷал меояд
روی تو که عقل ازو خجل میآید
Моҳӣаст ки баси меҳр гусал меояд
ماهی است که بس مهر گسل میآید
Давр аз рӯят чу шамъ азон мисўзм
دور از رویت چو شمع ازان میسوزم
Каз шамъи рахти сӯз ба дил меояд
کز شمعِ رخت سوز به دل میآید