Маро ки гуфт ки дили бугсал аз диёру зёр
مرا که گفت که دل بگسل از دیار و ز یار؟
Ки боди субҳи умедаш чу рӯзи ман шаби тор
که باد صبحِ امیدش چو روزِ من شبِ تار
Дилами бҳкм ки бартофт меҳр аз он сари зулф
دلم به حُکمِ که برتافت مِهر از آن سرِ زلف؟
Каз ӯ шудаст парокандаи ақлро сару кор
کز او شدست پراکنده عقل را سر و کار
Равонам арча ҷудо монад аз он ду наргиси шӯх
روانم ارچه جدا ماند از آن دو نرگسِ شوخ
Ки масти бода ӣ саҳаранд дар миёни хумор
که مستِ باده ی سِحرند در میانِ خمار
Ба бе қарори ду зулфу бдлФриби ду чашм
به بی قرار دو زلف و به دلفریب دو چشم،
Марои шикаста ӣ ғам кард ёри хастаи зор
مرا شکسته ی غم کرد یارِ خسته ی زار
Бимонад бо ман аз он ҳар ду длФриби фиреб
بماند با من از آن هر دو دلفریب، فریب
Змн бабрад бидон ҳар ду бе қарори қарор
ز من ببُرد بدان هر دو بی قرار، قرار
Фурӯғи он лаби лаълу хаёли он хати сабз
فروغِ آن لبِ لعل و خیالِ آن خطِ سبز
Ки оташ дил сабранду хори чашми виқор
که آتشِ دلِ صبرند و خارِ چشمِ وقار،
Гуҳии забун забунам кунанд бо ғами ишқ
گهی زبونِ زبونم کنند با غمِ عشق
Гуҳии асир асирам кунанд бе рухи ёр
گهی اسیرِ اسیرم کنند بی رخِ یار
Амомё чунигорат марои з даст бидод
امامیا چو نگارت مرا ز دست بداد
Ту дасту чеҳра ҳаме кун бхўни дида нигор
تو دست و چهره همی کُن به خونِ دیده نگار