Дорам аз зулфи сиёҳаши гилаи чандон ки мапурс
دارم از زلفِ سیاهش گِلِه چندان که مَپُرس
Ки чунон з ӯ шудаам бесару сомон ки мапурс
که چُنان ز او شدهام بی سر و سامان که مَپُرس
Кас ба умеди вафои тарки дилу дайни мкнод
کَس به امّیدِ وفا ترکِ دل و دین مَکُناد
Ки чунонам ман аз ин карда пушаймон ки мапурс
که چُنانم من از این کرده پشیمان که مپرس
Ба яке ҷуръа ки озори касаш дар пай нест
به یکی جرعه که آزارِ کَسَش در پِی نیست
Заҳматӣ май кашам аз мардуми нодон ки мапурс
زحمتی میکشم از مردمِ نادان که مپرس
Зоҳид аз мо ба саломат бигузар ки ин май лаъл
زاهد از ما به سلامت بگذر کـاین مِیِ لعل
Дилу дайн май барад аз даст бидон сон ки мапурс
دل و دین میبرد از دست بدان سان که مپرس
Гуфт вгўҳост дар ин роҳ ки ҷони бгдозд
گفتوگوهاست در این راه که جان بُگْدازد
Ҳар касе арбадае ин ки мубини он ки мапурс
هر کسی عربدهای این که مبین آن که مپرس
Порсоеу саломати ҳавасам буд , вале
پارسایی و سلامت هَوَسم بود، ولی
Шева Эй мекунад он наргиси фаттон ки мапурс
شیوهای میکند آن نرگسِ فَتّان که مپرس
Гуфтам аз гӯии фалаки сӯрати ҳолеи пурсам
گفتم از گویِ فلک صورتِ حالی پرسم
Гуфт он май кашами андари хами чавгон ки мапурс
گفت آن میکشم اندر خمِ چوگان که مپرس
Гуфтамаш зулф ба хӯн ки шикастӣ ? гуфто
گفتمش زلف به خونِ که شکستی؟ گفتا
Ҳофизи ин қисса дарозаст ба қуръон ки мапурс
حافظ این قصه دراز است به قرآن که مپرس