Шунидаам сухании хуш ки пер канъон гуфт
شنیدهام سخنی خوش که پیرِ کنعان گفت
« фироқи ёр , на он мекунад ки битавон гуфт »
«فِراق یار، نه آن میکند که بتوان گفت»
Ҳадиси ҳавли қиёмат ки гуфт воъизи шаҳр
حدیثِ هولِ قیامت که گفت واعظِ شهر
Кноитист ки аз рӯзгор ҳиҷрон гуфт
کنایتیست که از روزگارِ هجران گفت
Нишони ёри сФркрдаҳ аз ки пурсами боз ?
نشانِ یارِ سفرکرده از کِه پُرسم باز؟
Ки ҳар чаҳ гуфт бурид сабо парешон гуфт
که هر چه گفت بَریدِ صبا، پریشان گفت
Фиғон ки он маи номеҳрбони мҳргсл
فغان که آن مهِ نامهربانِ مِهرگُسِل
Ба тарки суҳбати ёрони худ чаҳ осон гуфт
به تَرکِ صحبتِ یاران خود چه آسان گفت
Ману мақоми ризои баъд аз ину шукри рақиб
من و مقامِ رضا بعد از این و شُکرِ رقیب
Ки дил ба дарди ту ху карду тарк дармон гуфт
که دل به دردِ تو خو کرد و ترکِ درمان گفت
Ғами куҳан ба май соли хӯрда дафъ кунед
غمِ کهن به میِ سالخورده دفع کنید
Ки тухми хуши дилӣ инаст пер деҳқон гуфт
که تخم خوشدلی این است؛ پیرِ دهقان گفت
Гиреҳ ба бод мазангар чаҳ бар мурод равад
گره به باد مزن گر چه بر مراد رود
Ки ин сухан ба мисли бод бо сулаймон гуфт
که این سخن به مَثَل، باد با سلیمان گفت
Ба муҳлатӣ ки сипеҳрат диҳад зи роҳи Марв
به مهلتی که سپهرت دهد ز راه مرو
Туро ки гуфт ки ин золи тарк дастон гуфт ?
تو را که گفت که این زال تَرک دَستان گفت؟
Мазан з чун ва чаро дам ки бандаи мқбл
مزن ز چون و چرا دم که بندهٔ مُقبِل
Қабул кард ба ҷон ҳар сухан ки ҷонон гуфт
قبول کرد به جان، هر سخن که جانان گفت
Ки гуфт ҳофиз аз андеша ту омад боз ?
که گفت حافظ از اندیشهٔ تو آمد باز؟
Ман ин нагуфтаам он кас ки гуфт бӯҳтон гуфт
من این نگفتهام آن کس که گفت بُهتان گفت