Сӣли исои алайҳ ё рӯҳи аллоҳ эй шииءи аъзами вмои асъби фии алднёи волохраҳи қоли ғазаби аллоҳи қолўои вмои инҷии ани злки қоли ани тксри ғзбку ткзми ғизки тариқи он буд : чун нафас хоҳад ки шикоят кунад , хилоф ӯ кунад ва шукр гуяд ва муболиға кунад ; чандоне ки дар андаруни худ муҳаббат ӯ ҳосил кунад зеро шукри гуфтан ба дурӯғ , аз худои муҳаббат ҷустанаст . Чунин мефармоед мавлонои бузурги қудси аллоҳи сира ки алшкоиаҳи ани алмхлўқи шкоиаҳи ани алхолқ ва фармуд душманӣу ғайз дар ғайбати ту , бар ту пинҳонаст , ҳамчун оташ чун дидӣ ки ситорае ҷусти онро бикаш то ба адам боз равад аз онҷо ки омадааст . Ва агар мадад кунӣ ба кибряти ҷавобӣу лафзи муҷозотӣ , раҳ ёбад . Ва аз адам дигар ва дигар равон шаваду душвори тавон онро бозФрстодн ба адам . АдФъи болатии ҳаии аҳсан то қаҳр аду карда бошӣ аз ду ваҷҳ : яке онкии адуи гӯшту пӯст ӯ нест андеша радӣаст ; чу дафъ шуд аз ту ба бисёре шукр ҳар оинаи азу низ дафъ шавад . Яке табъан ки алонсони убайди алоҳсону дувум чу фоида набинад чунонк кӯдакони якеро ба номӣ мехонанд ӯ дашном медиҳад ; эшонро рағбат зиёдат мешавад ки « сухани мо амал кард » ва агар тағйир ( ? тағайюр ) набенанду фоида Эй набенанд майлашон намонад . Дувуми онкӣ чу ин сифати афвӣ дар ту пайдо ояд маълум шавад ки мазаммат ӯ дурӯғаст ; каж дидааст , ӯ туро чунонк туе надидааст , ва маълум шавад ки мазмум ӯст на ту . Ва ҳеҷ ҳуҷҷатии хасмро хаҷалтар аз он накунад ки дурӯғӣ ӯ зоҳир шавад . Пас ту ба ситоиш дар шукр ӯро заҳр май диҳӣ зеро ки изҳори нақсоне ту мекунад ту камоли худ зоҳир кардӣ ки маҳбӯби ҳақӣ ки волъоФини ани анноси валлоҳи иҳби алмҳснини маҳбӯби ҳақ ноқис набошад чандонаш бсто ки ёрон ӯ ба гумон уфтанд ки магар бо мо ба нифоқаст ки бо Ӯши чандон иттифоқаст . Шеър : бркн ба рФқи сблтшон гарчи давлатанд башикан ба ҳукм , гарданашон гарчи гардананд вФқнооллаҳи лиҳозо .

سُئِلَ عِیْسی عَلَیْهِ یَا رُوْحَ اللهِّ اَیُّ شَیْیءِ اَعْظَمُ وَمَا اَصْعَبُ فِی الدُّنْیا وَالْآخِرَةِ قَالَ غَضَبُ اللهِّ قَالوا وَمَا یَنْجِی عَنْ ذلِکَ قَالَ اَنْ تَکْسِرَ غَضَبَکَ وَ تَکْظِمَ غَیْظَکَ طریق آن بود: چون نفس خواهد که شکایت کند، خلافِ او کند و شکر گوید و مبالغه کند؛ چندانی که در اندرون خود محبّت او حاصل کند زیرا شکر گفتن به دروغ، از خدا محبّت جستن است. چنین می‌فرماید مولانای بزرگ قدس الله سره که اَلشِّکَایَةُ عَنِ الْمَخْلُوْقِ شِکَایَةٌ عَنِ الْخَالِقِ و فرمود دشمنی و غیظ در غیبتِ تو، بر تو پنهان است، همچون آتش چون دیدی که ستاره‌ای جَست آن را بکُش تا به عدم باز رود از آنجا که آمده است. و اگر مدد کنی به کبریتِ جوابی و لفظِ مجازاتی، ره یابد. و از عدمْ دگر و دگر روان شود و دشوار توان آن را بازفرستادن به عدم. اِدْفَعْ بِالَّتِیْ هِیَ اَحْسَنُ تا قهر عدو کرده باشی از دو وجه: یکی آنکه عدو گوشت و پوست او نیست اندیشهٔ ردی است؛ چو دفع شد از تو به بسیاری شکر هر آینه ازو نیز دفع شود. یکی طبعاً که اَلْاِنْسَانُ عَبِیْدُ الْاِحْسَانِ و دوم چو فایده نبیند چنانک کودکان یکی را به نامی می‌خوانند او دشنام می‌دهد؛ ایشان را رغبت زیادت می‌شود که «سخن ما عمل کرد» و اگر تغییر (؟تغیّر) نبینند و فایده‌ای نبینند میلشان نمانَد. دوم آنکه چو این صفت عفوی در تو پیدا آید معلوم شود که مذمّت او دروغ است؛ کژ دیده است، او ترا چنانک تویی ندیده است، و معلوم شود که مذموم اوست نه تو. و هیچ حجّتی خصم را خجل‌تر از آن نکند که دروغی او ظاهر شود. پس تو به ستایش در شکّر او را زهر می‌دهی زیرا که اظهار نقصانی تو می‌کند تو کمال خود ظاهر کردی که محبوب حقّی که وَالْعَافِیْنَ عَنِ النَّاسِ وَاللهُّ یَحِبُّ الْمُحْسِنیْنَ محبوب حق ناقص نباشد چندانش بستا که یاران او به گمان افتند که مگر با ما به نفاق است که با اوش چندان اتّفاق است. شعر: برکن به رفق سبلتشان گرچه دولتند    بشکن به حکم، گردنشان گرچه گردنند وَفَقنَّااللهُّ لِهذا.