Он ғариби мумтаҳан аз бими вом
آن غریب ممتحن از بیم وام
Дар раҳ омад сӯии он доруссалом
در ره آمد سوی آن دارالسلام
Шуд сӯии табризу кӯии гулистон
شد سوی تبریز و کوی گلستان
Хуфтаи аўмидши фарози гули ситон
خفته اومیدش فراز گل ستان
Зад зи доролмлки табризи суннӣ
زد ز دارالملک تبریز سنی
Бар умедаши равшанӣ бар равшанӣ
بر امیدش روشنی بر روشنی
Ҷонаш хандон шуд аз он равзаи риҷол
جانش خندان شد از آن روضهٔ رجال
Аз насими Юсуфу Мисри висол
از نسیم یوسف و مصر وصال
Гуфт ё ҳодии анхи лии ноқтӣ
گفت یا حادی انخ لی ناقتی
Ҷоءи асъодӣу торти Фоқтӣ
جاء اسعادی و طارت فاقتی
Абркӣ ё ноқтии тоби аломўр
ابرکی یا ناقتی طاب الامور
Ани тбризои мнохоти алсдўр
ان تبریزا مناخات الصدور
Асрҳӣ ё ноқтии ҳавли алрёз
اسرحی یا ناقتی حول الریاض
Ани тбризои лнои нъми алмФоз
ان تبریزا لنا نعم المفاض
Сорбоно бор бигушо зи уштурон
ساربانا بار بگشا ز اشتران
Шаҳр табризасту кӯии гулистон
شهر تبریزست و کوی گلستان
Фар Фирдавсӣаст ин полез ро
فر فردوسیست این پالیز را
Шаъшааи ършисти ин табриз ро
شعشعهٔ عرشیست این تبریز را
Ҳар замонии нури рӯҳи ангези ҷон
هر زمانی نور روحانگیز جان
Аз фарози арш бар табризён
از فراز عرش بر تبریزیان
Чун всоқи мӯҳтасиби ҷусти он ғариб
چون وثاق محتسب جست آن غریب
Халқ гуфтандаш ки бигузашт он ҳабиб
خلق گفتندش که بگذشت آن حبیب
ӯ прир аз дори дунё нақл кард
او پریر از دار دنیا نقل کرد
Марду зан аз воқеа ӯ рӯй зард
مرد و زن از واقعهٔ او رویزرد
Рафт он тоўси аршии сӯии арш
رفت آن طاوس عرشی سوی عرش
Чун расед аз ҳотифонаши буии арш
چون رسید از هاتفانش بوی عرش
Сояаш гарчи паноҳи халқ буд
سایهاش گرچه پناه خلق بود
Дар навардед офтобаши зуди зуд
در نوردید آفتابش زود زود
Ронад ӯ киштии азин соҳили прир
راند او کشتی ازین ساحل پریر
Гашта буд он хоҷаи зини ғами хонаи сайр
گشته بود آن خواجه زین غمخانه سیر
Наъра Эй зад марду биҳуши аўФтод
نعرهای زد مرد و بیهوش اوفتاد
Гўиё ӯ низ дар пай ҷон бидод
گوییا او نیز در پی جان بداد
Пас гулобу об бар рӯйиш заданд
پس گلاب و آب بر رویش زدند
ҲамРаҳон бар ҳолаташ гирён шуданд
همرهان بر حالتش گریان شدند
То ба шаб бехеш буду баъд аз он
تا به شب بیخویش بود و بعد از آن
Ним мурдаи бозгашт аз ғайби ҷон
نیم مرده بازگشت از غیب جان