Саҳари ин дили ман зи савдо чаҳ ме шуд
سحر این دل من ز سودا چه میشد
Аз он барқи рухсору симо чаҳ ме шуд
از آن برق رخسار و سیما چه میشد
Аз он талъати хуш ва зон обу оташ
از آن طلعت خوش و زان آب و آتش
зи фарқи сари банда то по чаҳ ме шуд
ز فرق سر بنده تا پا چه میشد
Худоёи ту доне ки бар мо чаҳ омад
خدایا تو دانی که بر ما چه آمد
Худоёи ту доне ки моро чаҳ ме шуд
خدایا تو دانی که ما را چه میشد
зи райҳону гулҳо ки раведи зи дил ҳо
ز ریحان و گلها که روید ز دلها
Саросари ҳамаи дашту саҳро чаҳ ме шуд
سراسر همه دشت و صحرا چه میشد
зи хуршеди пурсӣ ки гардун чаҳ сони бад
ز خورشید پرسی که گردون چه سان بد
з ма пресс борӣ ки ҷавзо чаҳ ме шуд
ز مه پرس باری که جوزا چه میشد
зи маъшӯқи аъзам ба ҳар ҷони хуррам
ز معشوق اعظم به هر جان خُرَّم
Ба пастӣ чаҳ омад ба боло чаҳ ме шуд
به پستی چه آمد به بالا چه میشد
Таъолии тақаддус чу бинмуд худ ро
تعالی تقدس چو بنمود خود را
Муқаддаси дилӣ аз таъолӣ чаҳ ме шуд
مقدس دلی از تعالی چه میشد
Чу мекард бахшиши назари шамси табриз
چو میکرد بخشش نظر شمس تبریز
Ба бино чаҳ бахшеду бино чаҳ ме шуд
به بینا چه بخشید و بینا چه میشد