Ба аҳди чашми ту як дил умедвор нашуд
به عهد چشم تو یک دل امیدوار نشد
Бирав ки аҳди ту баргардади инки кор нашуд
برو که عهد تو برگردد اینکه کار نشد
Ба рӯзгори ту як рӯзи хуш ба кас нагирифт
به روزگار تو یک روز خوش به کس نگذشت
Хушат мабод ки ин рӯз рӯзгор нашуд
خوشت مباد که این روز روزگار نشد
Нарехт бода ба даври ту дар гулӯӣ касе
نریخت باده به دور تو در گلوی کسی
Ки дар шиканҷаи андешае хумор нашуд
که در شکنجهٔ اندیشهای خمار نشد
Ба пои гулбуни навмидии ту кас нанишаст
به پای گلبن نومیدیات کسی ننشست
Ки брнхостаҳи захмии зи неш хор нашуд
که برنخاسته زخمی ز نیش خار نشد
Хатат гушӯд дар боғи сабз бар дил , дил
خطت گشود در باغ سبز بر دل، دل
Шукуфтаи гашт ба як гул вале баҳор нашуд
شکفته گشت به یک گل ولی بهار نشد
Қарори зулфи ту ва бе қарории дили мо
قرار زلف تو و بیقراریِ دل ما
Ба ин қарор намемонад ин қарор нашуд
به این قرار نمیماند این قرار نشد
Фиканда аз чаҳ паии сайди мурғи хонаи каманд
فکنده از چه پی صید مرغ خانه کمند
Шикори каркас ва шоҳин кун , ин шикор нашуд
شکار کرکس و شاهین کن، این شکار نشد
зи қатли оми Луристону фатҳи хузистон
ز قتل عام لرستان و فتح خوزستان
Чу ҳинду нодир , асбоб ифтихор нашуд
چو هند و نادر، اسباب افتخار نشد
Ниҳоли мардӣу мардонагӣ чунон хушкед
نهال مردی و مردانگی چنان شد خشک
Ки сол ҳо шуд ва як нодир ошкор нашуд
که سالها شد و یک نادر آشکار نشد
Зимоми мамлакати он сон ба даст ғайр афтод
زمام مملکت آن سان به دست غیر افتاد
Ки бе лаҷоми кас аз вай зимомдор нашуд
که بیلجام کس از وی زمامدار نشد
Чаҳ миллатӣаст ки нобӯди бод то ба абад
چه ملتی است که نابود باد تا به ابد
Чаҳ давлатӣаст ки худсар чаҳ ӯ ба кор нашуд
چه دولتی است چو او خودسری به بار نشد
На номи мондании нанги зини ду дар гетӣ
نه نام ماندنی ننگ زین دو در گیتی
Шаванд маҳв ки ин шаҳр ва шаҳриёр нашуд
شوند محو که این شهر و شهریار نشد
зи шоҳсозӣу дрборбозии ин миллат
ز شاهسازی و درباربازی این ملّت
Магар надид ду сад бор , бор бор нашуд
مگر ندید دو صد بار، بار بار نشد
Мадори чашми таваққуъ ба онкии чашми тамаъ
مدار چشم توقع به آنکه چشم طمع
Ба мол дорад , ин мамлакат мадор нашуд
به مال دارد، این مملکت مدار نشد
Надошт орифи айбии ҷуз аз надорӣ ва гуфт
نداشت عارف عیبی جز از نداری و گفت
Ки гуфт инки надорӣ ки айб ва ор нашуд
که گفت اینکه نداری که عیب و عار نشد