Махдуми ман . Мактуби ҷоҷолӣ манзумӣаст ки баъд аз муҳоҷирати меҳрбони анФоди Ереван шуда буд албата ба назар расидааст . Аввалаши ин буд ки :
مخدوم من. مکتوب جاخالی منظومی است که بعد از مهاجرت مهربان انفاد ایروان شده بود البته به نظر رسیده است. اولش این بود که:
Оҳ аз он дам ки рафт лобуду ночор
آه از آن دم که رفت لابد و ناچار
Рӯ ба раҳи Еревани савораи қоҷор
رو به ره ایروان سوارهٔ قاجار
Ёри ман аз ман ҷудо шуд он даму гаштам
یار من از من جدا شد آن دم و گشتم
Ёр ба андӯҳу ранҷу ғуссаи тимор
یار به اندوه و رنج و غصهٔ تیمار
Аммо ; он рӯзҳо ҳамон ҳимояти мФорқт буду нотамом фиристода будам . Гузориши сафари нхчўону хуии худамону маъмурияти табриз ва се бор рафт ва омад банда . Шумо бо элчи барои созишу караи баъди ахрии ихтилофи ороъу соири ғробти иттифоқотро надошт мо лоъини роту лои изни самъат . Сухан бисёраст , маҷол арз нест , худои замони мулоқотро бо ҳасани ваҷҳ мрзўқ кунад .
اما؛ آن روزها همان حمایت مفارقت بود و ناتمام فرستاده بودم. گزارش سفر نخچوان و خوی خودمان و مأموریت تبریز و سه بار رفت و آمد بنده. شما با ایلچی برای سازش و کرّهً بعد اخری اختلاف آراء و سایر غرابت اتفاقات را نداشت ما لاعین رات و لا اذن سمعت. سخن بسیار است، مجال عرض نیست، خدا زمان ملاقات را با حسن وجه مرزوق کند.
Агар ани шоаллоҳи таъолии қабзи ин тнхўоаҳ ки мавқуфи алайҳ мусолиҳааст , қабл аз мавъид аз мкнил соҳиб бирасад , фироқӣу димоғии бФзли худо ҳам мерасад ки бози иттифоқ суҳбат уфтаду ҳавосро ҷамъият бошад , волои боқии достонро фии явми кони миқдораи хумсин алифи сана , мърўз остон хоҳам дошт . Ин рӯзҳои даҳ соъатӣ на соъатиро чандон зарф нест ки маҷоли он ҳама ҳарф бошад .
اگر ان شاءالله تعالی قبض این تنخواه که موقوف علیه مصالحه است، قبل از موعد از مکنیل صاحب برسد، فراغی و دماغی بفضل خدا هم میرسد که باز اتفاق صحبت افتد و حواس را جمعیت باشد، والا باقی داستان را فی یوم کان مقداره خمسین الف سنه، معروض آستان خواهم داشت. این روزهای ده ساعتی نه ساعتی را چندان ظرف نیست که مجال آن همه حرف باشد.
вассалом
والسلام