Чаҳ меҳнатаст ки дар ошиқӣ ба мо нарасед
چه محنت است که در عاشقی به ما نرسید
Куҷои шудем ки сад фитна аз қафо нарасед
کجا شدیم که صد فتنه از قفا نرسید
Ба рӯй мо ҳама ранҷӣ расед дар ғами дӯст
به رویِ ما همه رنجی رسید در غمِ دوست
Магар ки роҳати рӯйиш ба рӯй мо нарасед
مگر که راحتِ رویش به رویِ ما نرسید
Фароғати дил аз он доштем як чанде
فراغتِ دل از آن داشتیم یک چندی
Ки ишқ ӯ ба сари ҷон мубтало нарасед
که عشقِ او به سرِ جانِ مبتلا نرسید
Тамаъ ба васл чу ӯе ҳамоқатии сети азим
طمع به وصلِ چو اویی حماقتی ست عظیم
Ки подшоҳии олам ба ҳар гадо нарасед
که پادشاهیِ عالم به هر گدا نرسید
Агар зи ишқи маломат ба мо расад чаҳ аҷаб
اگر ز عشق ملامت به ما رسد چه عجب
Балои сарзаниши ошиқот куҷо нарасед
بلایِ سرزنشِ عاشقات کجا نرسید
зи ҳиҷру васл чаҳ нуқсони камоли маҷнӯн ро
ز هجر و وصل چه نقصان کمالِ مجنون را
Агар ба хилват Лайлӣ расед ё нарасед
اگر به خلوتِ لیلی رسید یا نرسید
Нзорё чу ту рафтанди раҳи равон бисёр
نزاریا چو تو رفتند ره روان بسیار
Ки як равандаи дарин раҳ ба мунтаҳо нарасед
که یک رونده درین ره به منتها نرسید