Абуҳурира , разии аллоҳи анҳу , ҳар рӯз ба хизмати Мустафо , слии аллоҳи алайҳ , омадӣ . Гуфт : ё абоҳрираҳ ! зрнии ғбо , тздди ҳбо : ҳар рӯзи мё то муҳаббат зиёдат шавад .
ابوهُرَیْرَه، رَضِیَ اللهُ عَنْهُ، هر روز به خدمتِ مصطفی، صَلَّی اللهُ عَلَیْهِ، آمدی. گفت: یا اَباهُرَیْرَةٍ! زُرْنی غِبّاً، تَزْدَدْ حُبّاً: هر روز میا تا محبّت زیادت شود.
Соҳибдилиро гуфтанд : бад-ӣни хӯбӣ ки офтобаст , нашунидаем ки кас ӯро дӯст гирифтааст ва ишқ оварда . Гуфт : барои онкӣ ҳар рӯз метавон дид магар дар зимистон ки маҳҷӯбасту маҳбӯб .
صاحبدلی را گفتند: بدین خوبی که آفتاب است، نشنیدهایم که کس او را دوست گرفته است و عشق آورده. گفت: برای آنکه هر روز میتوان دید مگر در زمستان که محجوب است و محبوب.
Ба дидори мардум шудан айб нест
به دیدارِ مردم شدن عیب نیست
Валикин на чандон ки гӯйанд : бас
ولیکن نه چندان که گویند: بس
Агар хештанро маломат кунӣ
اگر خویشتن را ملامت کنی
Маломат набояд шунидат зи кас
ملامت نباید شنیدت ز کس