Ёд дорам ки дар айёми ҷавонии гузари доштам ба кӯеу назар бо рӯе , дар тамӯзӣ ки ҳрўрши даҳони бхўшонидӣу сумумаши мағзи устихони бҷўшонидӣ .
یاد دارم که در ایّامِ جوانی گذر داشتم به کویی و نظر با رویی، در تموزی که حَرورش دهان بخوشانیدی و سَمومش مغز استخوان بجوشانیدی.
Аз заъфи башарияти тоби офтоб ҳҷир наёвардаму илтиҷо ба соя деворӣ кардам , мтрқб ки касе ҳури тамӯз аз ман ба баради обии фурӯи нишонд ки ҳаме ногоҳ аз зулмати даҳлези хонае равшанӣ битофт , яъне ҷамолӣ ки забони фасоҳат аз баёни сабоҳат ӯ оҷиз ояд , чунон ки дар шаби тории субҳ бар ояд ё оби ҳаёт аз зулмот ба дар ояд , қадаҳии брФоб бар дасту шукр дар он рехта ва ба арақ бар омехта , надонам ба гулобаш мтиб карда буд ё қатрае чанд аз гули рӯйиш дар он чакида .
از ضعفِ بشریّت تابِ آفتابِ هَجِیر نیاوردم و التجا به سایهٔ دیواری کردم، مترقّب که کسی حَرِّ تموز از من به بَرد آبی فرو نشاند که همی ناگاه از ظلمتِ دهلیزِ خانهای روشنی بتافت، یعنی جمالی که زبانِ فصاحت از بیانِ صَباحتِ او عاجز آید، چنان که در شب تاری صبح بر آید یا آبِ حیات از ظلمات به در آید، قدحی برفاب بر دست و شکر در آن ریخته و به عرق برآمیخته. ندانم به گلابش مطیّب کرده بود یا قطرهای چند از گلِ رویش در آن چکیده.
Фии алҷмлаҳи шароб аз дасти нгоринш бар гирифтам ва бихӯрадаму умр аз сар гирифтам :
فیالجمله شراب از دستِ نگارینش برگرفتم و بخوردم و عمر از سر گرفتم:
Змأи бқлбии лои икоди исиғаҳ
ظَمَأٌ بِقَلْبی لا یَکادُ یُسیغُهُ
РшФи алзлолу луи шарбати бҳўро
رَشْفُ الزُّلالِ وَلَوْ شَرِبْتُ بُحُوراً
Хуррами он фархундаи толеъро ки чашм
خرّم آن فرخندهطالع را که چشم
Бар чунин рӯй аўФтд ҳар бомдод
بر چنین روی اوفتد هر بامداد
Маст мебедор гардад нимшб
مستِ می بیدار گردد نیمشب
Масти соқии рӯзи маҳшари бомдод
مستِ ساقی، روزِ محشر بامداد