Чун оли тоҳо аз ҷаври айём
چون آلِ طاها، از جورِ ایام
Гаштанди ворид дар кишвари шом
گشتند وارد، در کشورِ شام
Гуфтои сакина дар маҳзари ом
گفتا سکینه، در محضرِ عام:
эй халқ бераҳм эй қавми бадном
«ای خلقِ بیرحم! ای قومِ بدنام!»
Нҳни сбоёи оли Муҳамад
(نحنُ سَبایا، آلِ محمد)
Ҷаддии расӯли фии кули Машҳад
(جَدّی رسولٌ، فی کلِّ مشهد)
Мо айни қибла асл намозем
ما عینِ قبله، اصلِ نمازیم
Султони Ясриб шоҳ ҳиҷозем
سلطانِ یثرب، شاهِ حجازیم
Аз ҳукми қуръон мо сарфарозем
از حکمِ قرآن، ما سرفرازیم
Дар кишвари дайн дар малики ислом
در کشورِ دین، در مُلکِ اسلام
Нҳни сбоёи оли Муҳамад
(نحنُ سَبایا، آلِ محمد)
Ҷаддии расӯли фии кули Машҳад
(جَدّی رسولٌ، فی کلِّ مشهد)
Мо кандарин шаҳри зор ва малулем
ما کاندر این شهر، زار و ملولیم
Аз муҳӣти ваҳй аз байти илҳом
از محیطِ وحی، از بیتِ الهام
Нҳни сбоёи оли Муҳамад
(نحنُ سَبایا، آلِ محمد)
Ҷаддии расӯли фии кули Машҳад
(جَدّی رسولٌ، فی کلِّ مشهد)
Хуш менавозед ноӣу нақора
خوش مینوازید، نای و نقاره
Гардӣда бар мо гарми назора
گردیده بر ما، گرمِ نظاره
Хуши парда шарм гардид пора
خوش پردهٔ شرم، کردید پاره
Бар ол ёсин додед дашном
بر آلِ یاسین، دادید دشنام!
Нҳни сбоёи оли Муҳамад
(نحنُ سَبایا، آلِ محمد)
Ҷаддии расӯли фии кули Машҳад
(جَدّی رسولٌ، فی کلِّ مشهد)
Бо синаи риш бо қалби пурғам
با سینهٔ ریش، با قلبِ پُرغم
Бо сари урён бо чашми пари нам
با سَرِ عریان، با چشمِ پُرنم
Моро намуданд саргурди олам
ما را نمودند، سرگَردِ عالم
Аз касрати буғз аз рӯй ибром
از کثرتِ بغض، از رویِ ابرام
Нҳни сбоёи оли Муҳамад
(نحنُ سَبایا، آلِ محمد)
Ҷаддии расӯли фии кули Машҳад
(جَدّی رسولٌ، فی کلِّ مشهد)
Рӯзӣ ки қуръон гардид нозил
روزی که قرآن، گردید نازل
Бар ҳурмати мо май буд шомил
بر حرمتِ ما، میبود شامل
Моро хароба додед манзил
ما را خرابه، دادید منزل
Аз ҷои ҳурмат аз баҳри икром
از جایِ حرمت، از بهرِ اکرام!
Нҳни сбоёи оли Муҳамад
(نحنُ سَبایا، آلِ محمد)
Ҷаддии расӯли фии кули Машҳад
(جَدّی رسولٌ، فی کلِّ مشهد)
Охир ғарибем мо оли ҳайдар
آخر غریبیم، ما آلِ حیدر
Дар кишвари шом эй халқи кофар
در کشورِ شام، ای خلقِ کافر!
То чанд моро резед бар сар
تا چند ما را، ریزید بر سر
Хокистару санг аз пушт ҳар бом
خاکستر و سنگ، از پشتِ هر بام؟
Нҳни сбоёи оли Муҳамад
(نحنُ سَبایا، آلِ محمد)
Ҷаддии расӯли фии кули Машҳад
(جَدّی رسولٌ، فی کلِّ مشهد)
Дар ин вилоят мо миҳмонем
در این ولایت، ما میهمانیم
Чун тоири давр аз ошёнем
چون طایرِ دور، از آشیانیم
То кӣ бар афлоки шевани расонем
تا کی بر افلاک، شیون رسانیم
Аз нолаи субҳ аз гиряи шом
از نالهٔ صبح، از گریهٔ شام؟
Нҳни сбоёи оли Муҳамад
(نحنُ سَبایا، آلِ محمد)
Ҷаддии расӯли фии кули Машҳад
(جَدّی رسولٌ، فی کلِّ مشهد)
Гар дами шабу рӯз дар нола чун не
گردم شب و روز، در ناله چون نی
Монанди ( сомит ) шуд умри ман тай
مانند «صامت»، شد عمرِ من طی
Дар меҳнату ранҷ дар ҳузну олом
در محنت و رنج، در حُزن و آلام
Нҳни сбоёи оли Муҳамад
(نحنُ سَبایا، آلِ محمد)
Ҷаддии расӯли фии кули Машҳад
(جَدّی رسولٌ، فی کلِّ مشهد)