Омад маи ғами баҳри азодории зайнаб

آمد مَه غم، بهر عزاداریِ زینب

Шуд мавсими ғмхўорӣ бе ёрии зайнаб

شد موسمِ غمخواریِ بی‌یاریِ زینب

Кӯи шери худои шоҳи Наҷаф то ки бияёд

کو شیرِ خدا، شاهِ نجف، تا که بیاید

Дар крбу балои баҳри ҳаводории зайнаб

در کرب‌وبلا، بهرِ هواداریِ زینب؟

Фарёд ки аз зулми язиди он саг мешавам

فریاد! که از ظلمِ یزید، آن سگِ مَیْشُوم

Фарзанди набии кушта шуда бекасу мазлӯм

فرزندِ نبی کشته شده، بی‌کس و مظلوم

Хӯн шуд дили ҳайдари зи аламдории кулсум

خون شد دلِ حیدر، ز علم‌داریِ کلثوم

Сӯзади дили Заҳрои зи ҷилавдории зайнаб

سوزد دلِ زهرا، ز جلوداریِ زینب

Сарви қади Акбар чу дар он домани саҳро

سروِ قدِ اکبر، چو در آن دامنِ صحرا

Афтод зи шамшери ситамкории аъдо

افتاد ز شمشیرِ ستمکاریِ اعدا

Зад таънаи синони гоҳ ба дилдории Лайло

زد طعنه سنان، گاه به دلداریِ لیلا

Хандид гуҳии шимур ба ғмхўории зайнаб

خندید گَهی شمر، به غمخواریِ زینب

Бинишаст чу шимури шқии он кофари даврон

بنشست چو شمرِ شقی، آن کافرِ دوران

Бар сина бе кӣнаи султони шаҳидон

بر سینهٔ بی‌کینهٔ سلطانِ شهیدان

намегуфт ки эй шимур мабар бо лаби аташон

می‌گفت که: ای شمر! مَبَر با لبِ عطشان

Сар аз танам охир бингар зории зайнаб

سَر از تنم آخر، بنگر زاریِ زینب!

Бурданд чу аз рухи сипаҳи шоми ниқобаш

بردند چو از رخ، سپهِ شام، نقابش

Бастанд чу бар гардану бозуии танобаш

بستند چو بر گردن و بازو، طنابش

намекард зи ғам рӯй тазаррӯъи сӯии бобаш

می‌کرد ز غم، رویِ تضرع سویِ بابش

К-эии боби надории хабар аз зории зайнаб

کای باب! نداری خبر از زاریِ زینب؟

Он шаб ки равон шуд ба сӯии Кӯфаи вайрон

آن شب که روان شد به سویِ کوفهٔ ویران

Доданд ба ваии ҷои зи ҷафои гӯшаи зиндон

دادند به وی جا ز جفا، گوشهٔ زندان

Май буд дар он нимаи шаби нолаи Тифлон

می‌بود در آن نیمهٔ شب، نالهٔ طفلان

Дар Кӯфаи ғами мӯниси бедории зайнаб

در کوفهٔ غم، مونسِ بیداریِ زینب

Дар шом ба вайрона чу доданд маконаш

در شام، به ویرانه چو دادند مکانش

Хӯни гашт чу ( сомит ) зи басари ашки рӯонаш

خون گشت چو «صامت»، ز بصر اشکِ روانش

Шоҳ шуҳадоъ дид чу бетоб ва туонаш

شاهِ شهدا دید چو بی‌تاب و توانش

Омад ба сар аз баҳри парастории зайнаб

آمد به سَر، از بهرِ پرستاریِ زینب