Гуфт шаҳи ташнаи лабони зери теғ

گفت شهِ تشنه‌لبان زیرِ تیغ:

Оби зи шамшер маро орзӯаст

«آب ز شمشیر مرا آرزوست!

Аз паии парвози сари кӯии ёр

از پیِ پروازِ سرکویِ یار،

Пари зи пари тир маро орзӯаст

پَر ز پَرِ تیر مرا آرزوست!»

Каз ғамат эй Акбари раънои ҷавон

«کز غمت ای اکبرِ رعناجوان!

То ки бисӯзам ҳамаи куну макон

تا که بسوزم همه کَون و مکان،

Оҳи ҷаҳонгир маро орзӯаст

آهِ جهانگیر مرا آرزوست!»

Тифли ятеми ҳасани Муҷтабо

طفلِ یتیمِ حسنِ مجتبی

Гуфт ки эй амма маро кун раҳо

گفت که: «ای عمه! مرا کن رها،

Ҷон кунам андари раҳи ъмми фидо

جان کُنم اندر ره عمّم فدا؛

Боғи ҷинон дар бар шҳзодаҳ ҳо

باغِ جَنان در بر شهزاده‌ها

Асғар бешер маро орзӯаст

اصغرِ بی‌شیر مرا آرزوست»

Баст чу шимур аз раҳи ҷавру ситам

بست چو شمر از رهِ جور و ستم

Силсила бар бозуии сайди ҳарам

سلسله بر بازویِ صیدِ حَرم

Гуфт аз ин силсилаи зайнаб чаҳ ғам

گفت از این سلسله، زینب چه غم؟

Ҳамдами худ дар раҳи шоми хароб

«همدمِ خود در ره شامِ خراب،

Нолаи занҷир маро орзӯаст

نالهٔ زنجیر مرا آرزوست!»

( сомит ) аз ин воқеаи дарднок

«صامت»! از این واقعهٔ دردناک

Зан ба сару ҷома ба тани сози чок

زن به سَر و جامه به تن ساز چاک

То шӯй аз ин ғами азмии ҳалок

تا شَوی از این غمِ عظمیٰ هلاک؛

Баҳри азои шаҳи дайни зери хок

بهرِ عزایِ شهِ دین، زیرِ خاک،

Қӯти таҳрир маро орзӯаст

قوّتِ تحریر مرا آرزوست!