Имрӯз ошурост ё ид қурбон аст
امروز عاشوراست یا عیدِ قربان است؟
Крбу бало яксар аз хӯн гулистон аст
کرب و بلا یکسر، از خون گلستان است
Малику малики гирёни арзу самои ларзон
مُلک و مَلِک گریان، ارض و سما لرزان
Одам ба бе тобии олам дар афғон аст
آدم به بیتابی، عالم در افغان است
Бен саъди кофари бастаи чашм аз роҳи бадномӣ
بنِسعدِ کافر بسته چشم، از راهِ بدنامی
Биниҳода по дар роҳи куфру расми бадномӣ
بنهاده پا در راهِ کفر و رسمِ بدنامی
Сероб , аз оби Фурот аз кӯфӣу шомӣ
سیراب از آبِ فرات، از کوفی و شامی
Фарзанди пайғамбари мазлӯм ва аташон аст
فرزندِ پیغمبر، مظلوم و عطشان است
Аз баҳри фармони Убайдуллоҳи бади ойин
از بهرِ فرمانِ عبیداللهِ بدآیین
Бастанди чашм аз эҳтироми итрати ёсин
بستند چشم از احترامِ عترتِ یاسین
Бо хештани як дам нагуфт аз кӯфӣ бе дайн
با خویشتن یکدم نگفت آن کوفیِ بیدین:
Охири ҳусайн бар мо имрӯз меҳмон аст
«آخر حسین بر ما، امروز مهمان است»
Карданд чун бе каси зи қатли навҷавононаш
کردند چون بیکس ز قتلِ نوجوانانش
Шимур лъин омад барои ғорати ҷонаш
شمرِ لعین آمد برایِ غارتِ جانش
Як тан нагуфт эй шимур тар кун коми аташонаш
یکتن نگفت ای شمر! تَر کن کامِ عطشانش
Ин ташнаи мазлӯми охир мусулмон аст
این تشنهٔ مظلوم، آخر مسلمان است
Чун дид аҳволи ҳусайн бемуайянаш ро
چون دید احوالِ حسینِ بیمُعینش را
Зайнаб талаб кард аз Наҷафи боби ғминш ро
زینب طلب کرد از نجف، بابِ غمینش را
Гуфт эй падари байн шимур шаваму зулму кинаш ро
گفت ای پدر! بین شمرِ شوم و ظلم و کینش را
Бо тавсани бедоди саргарм ҷавлон аст
با توسنِ بیداد، سرگرمِ جولان است
Бобои биёи ҳангомаи маҳшар тамошо кун
بابا بیا هنگامهٔ محشر تماشا کن
Аз хаймаи гоҳи шоҳ бе сари сайр яғмо кун
از خیمهگاهِ شاهِ بیسر، سِیرِ یغما کن
Як дами назар бар зинати оғӯш Заҳро кун
یکدم نظر بر زینتِ آغوشِ زهرا کن
Бе сари ҳусайни ту дар хок ғалтонаст
بیسر حسینِ تو، در خاک غلتان است
Бингар з силӣ гашта нилӣ рӯй тФлонт
بنگر ز سیلی گشته نیلی، رویِ طفلانت
Бар гир аз ол зино дод итимонт
برگیر از آلِزنا، دادِ یتیمانت
Кун даст бар теғи ду сари дастам ба домонат
کُن دست بر تیغِ دوسر، دستم به دامانت
( сомит ) аз ин мотам пайваста гирёнаст
«صامت» از این ماتم، پیوسته گریان است