Набошад илтифотӣ бо ман акнӯн теғи қотил ро
نباشد التفاتی با من اکنون تیغ قاتل را
Ки созад нохудо дар мавҷи хӯнами матлаби дилро !
که سازد ناخدا در موج خونم مطلب دل را!
Ба ёди ҳасрати лаълаши ман аз худ май рӯми ҳрдм
به یاد حسرت لعلش من از خود میروم هردم
Ки май бандад ба дӯши нолаи ман бори маҳмил ро
که میبندد به دوش ناله من بار محمل را
Нимгар муҳаррами васлаш ба ҳиҷраши шукр май созам
نیم گر محرم وصلش به هجرش شکر میسازم
Ба ҷои шаҳди нӯшам дар ғамаши заҳри ҳалоҳил ро
به جای شهد نوشم در غمش زهر هلاهل را
Сари таслимро чун шамъи вақфи ханҷар ӯ кун
سر تسلیم را چون شمع وقف خنجر او کن
зи барқи оташи теғаши чароғи афрӯзи бсмлро !
ز برق آتش تیغش چراغ افروز بسمل را!
Ба як ойӣнаи арзи матлаби худ ме тавон кардан
به یک آیینه عرض مطلب خود میتوان کردن
Ки ҷуз ҳайрат намебошад ду мроти муқобил ро
که جز حیرت نمیباشد دو مرآت مقابل را
Барои эҳтиёҷ аз хиҷлати арзи ниёзи худ
برای احتیاج از خجلت عرض نیاز خود
Арақ аз ҷабҳа тӯфон мекунад ҳар лаҳзаи соил ро
عرق از جبهه طوفان میکند هر لحظه سائل را
Набошад зоҳидиро ҷузи ғурури ҷоҳи андари дил
نباشد زاهدان را جز غرور جاه اندر دل
зи машқи ҳақи парастии каси нафаҳмади қубҳи ботил ро
ز مشق حقپرستی کس نفهمد قبح باطل را
Агар хоҳӣ ки раҳи ёбии ту дар сарманзили зулфаш
اگر خواهی که ره یابی تو در سرمنزل زلفش
Муқобили соз дар пешонаи худ кавкаби дилро !
مقابل ساز در پیشانه خود کوکب دل را!
Писанди хотираши ашъор туғрул шуд аҷаб набӯд
پسند خاطرش اشعار طغرل شد عجب نبود
Писандади Мустафои маддоҳии сҳбони воӣлро !
پسندد مصطفی مداحی سحبان وائل را!