Буд он рӯз ки чашмам ба рахт боз шавад
بود آن روز که چشمم به رخت باز شود
Занги ғамҳои дилами ойӣна пардоз шавад ? !
زنگ غمهای دلم آیینهپرداز شود؟!
Қадаҳӣ аз май майхонаи чашмати нӯшам
قدحی از می میخانه چشمت نوشم
Пардаи шарм ба мизроби ҷунун соз шавад
پرده شرم به مضراب جنون ساز شود
Аз бисоти рух ту нарад тамошои бабрам
از بساط رخ تو نرد تماشا ببرم
Кишти ин дона ба мот аз ҳама мумтоз шавад
کشت این دانه به مات از همه ممتاز شود
Чаҳ кунам чора ки бо гирд висолат нарасад
چه کنم چاره که با گرد وصالت نرسد
Аспи бахтам ки зи фарзин шуда дар тоз шавад
اسپ بختم که ز فرزین شده در تاز شود
Бизосои дилу дайни бохта дар муҳраи ғам
بیضاسا دل و دین باخته در مهره غم
Фили иқболи ман эй кош ки шаҳбоз шавад !
فیل اقبال من ای کاش که شهباز شود!
эй хуши он рӯз ки ин туғрул беболу пурм
ای خوش آن روز که این طغرل بی بال و پرم
Ҷониби кӯии ту як бор ба парвоз шавад !
جانب کوی تو یک بار به پرواز شود!