Исмаши хоҷаи камоли аддӣн ва аз аҳли қаҳистони райу соҳиби Исмоили бен ибоди мураббии вай . Бо маҷди аддавлаи дайламии муосир ва дар ҳамаи фунуни камолоти қодир . Ашъори арабӣу форсӣ ва дайламӣ гуфтау гавҳари маъонӣ ба машаққати андешаи суфта . Заҳири фориёбӣ ки азмъорФ шеъраст , ӯро мдиҳ сарост . Ғараз , фозилии рафеъи алқдру фарзонае васеъ алсдр бӯда . Ин чанд байт аз ӯст :
اسمش خواجه کمال الدین و از اهل قهستان ری و صاحب اسماعیل بن عباد مربی وی. با مجد الدولهٔ دیلمی معاصر و در همهٔ فنون کمالات قادر. اشعار عربی و فارسی و دیلمی گفته و گوهر معانی به مشقت اندیشه سفته. ظهیر فاریابی که ازمعارف شعر است، او را مدیح سراست. غرض، فاضلی رفیع القدر و فرزانهای وسیع الصدر بوده. این چند بیت از اوست:
Азмрги ҳазар кардан ду рӯз раво нест
ازمرگ حذر کردن دو روز روا نیست
Рӯзӣ ки қазо бошад , рӯзӣ ки қазо нест
روزی که قضا باشد، روزی که قضا نیست
Рӯзӣ ки қазо бошад кӯшиш накунад суд
روزی که قضا باشد کوشش نکند سود
Рӯзӣ ки қазо нест дар он марг равонӣаст
روزی که قضا نیست در آن مرگ روانیست
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Бо бт мегуфт моҳӣ эй дар табу тоб
با بط میگفت ماهیای در تب و تاب
Бошад ки ба ҷӯии рафта боз ояд об
باشد که به جوی رفته باز آید آب
Бт гуфт чу ман қадед гаштами ту кабоб
بط گفت چو من قدید گشتم تو کباب
Дунёи пас марги мо чаҳ дарё чаҳ сароб
دنیا پس مرگ ما چه دریا چه سراب
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То тоҷи вилояти алӣ бар сармӣ
تا تاجِ ولایت علی بر سرمی
Ҳар рӯзи зи рӯзи рафтаи никўтрмӣ
هر روز ز روزِ رفته نیکوترمی
Сад шукр ки ин ки пешво , ҳидрмӣ
صد شکر که این که پیشوا، حیدرمی
Аз фазли худоу покии модрмӣ
از فضل خدا و پاکی مادرمی